लोकनायक जयप्रकाश अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन विकास केन्द्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम की रिपोर्ट :
वर्ष 2000-2025
-: 3 जुलाई 2000 :-
जे.पी. जन्म शताब्दी वर्ष से पूर्व संगोष्ठी श्रृंखला की पहली संगोष्ठी का आयोजन 3 जुलाई 2000 को किया गया। स्थल था- रफी मार्ग, नई दिल्ली स्थित कॉस्टीट्यूशनल क्लब और विषय था "नई सदी में संपूर्ण क्रांति की अवधारणा एवं उसकी प्रासंगिकता" । सामाजिक एवं जे.पी. को समर्पित सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा आयोजित संगोष्ठी के मुख्य अतिथि थे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री रवि राय। अन्य वक्ताओं में थे पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री जनेश्वर मिश्र, प्रख्यात हिन्दी समालोचक प्रो. नामवर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार तथा जनसत्ता के पूर्व संपादक श्री प्रभाष जोशी, पूर्व विधायक श्री रघुनाथ गुप्ता। गोष्ठी में संचालन को जे.पी. आन्दोलन के साथ सक्रियता से जुड़े पत्रकार कुमार अनुपम के प्रयास ने सफलता की दिशा दी। प्रस्तुत है उसी अविस्मरणीय संगोष्ठी की रूपरेखा ।
ऐसे समय में जब नयी पौध लोकनायक जयप्रकाश द्वारा किये गये कार्यों का मूल्यांकन नहीं कर पा रही है तथा वैश्वीकरण उदारीकरण और विज्ञान एवं तकनीकी क्रांति के दबावों के चलते आज अप्रसांगिक करार दिये गये लोकनायक जयप्रकाश के संपूर्ण क्रांति की परिकल्पना को साकार रूप देने की आवश्यकता आज अधिक महसूस हो रही है। आज की वर्तमान पृष्ठभूमि में लोकनायक जयप्रकाश के मूल्यों और उनकी विचारधारा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता आज बढ़ गयी है।
-: 5 मार्च 2001 :-
जे.पी. जन्म शताब्दी वर्ष से पूर्व संगोष्ठी श्रृंखला की दूसरी संगोष्ठी का आयोजन 5 मार्च 2001 को 'लो. ज.अ.अ. केन्द्र द्वारा रफी मार्ग, नई दिल्ली स्थित कॉस्टीट्यूशनल क्लब में किया गया। देश के प्रबुद्ध विचारकों, राजनीतिज्ञों, शिक्षाविदों एवं बुद्धिजीवियों ने इस गोष्ठी में हिस्सा लिया और प्रमुख वक्ता रहे श्री मधु दंडवते (पूर्व वित्त मंत्री), डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी (विधिवेत्ता एवं सांसद), श्री एन. के. सिंह (पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एवं समता पार्टी नेता), श्री जितेन्द्र सिंह (जे.पी. के निकटतम वरिष्ठ पत्रकार एवं सहयोगी) श्री दीनानाथ मिश्र (वरिष्ठ पत्रकार एवं सांसद) श्री वशिष्ठ नारायण सिंह (जे.पी. आन्दोलन के अग्रणी छात्र नेता एवं पूर्व सांसद) आदि। संगोष्ठी में जे.पी. और राम मनोहर लोहिया के आदर्शों एवं विचारों का पुनरावलोकन किया गया, साथ ही अध्ययन केन्द्र के राष्ट्रीय संयोजक श्री अजय कुमार एवं राष्ट्रीय सचिव श्री अभय सिन्हा ने जेपी के समाजवादी मूल्यों के पुनस्थापना के लिये आयोजन समिति के गठन पर विचार रखा जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया।
-: 5 जून 2001 :-
जे.पी. जन्म शताब्दी वर्ष से पूर्व संगोष्ठी श्रृंखला की तीसरी संगोष्ठी का आयोजन 5 जून 2001 को दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित राजेन्द्र भवन के सभागार में किया गया और इस विशिष्ट तिथि को "संपूर्ण क्रांति संकल्प दिवस" के रूप में मनाया गया। श्री रविराय (पूर्व लोकसभा अध्यक्ष), श्री इन्द्र कुमार गुजराल (पूर्व प्रधानमंत्री), भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री पी.वी. सावंत, गांधी स्मृति दर्शन समिति के उपाध्यक्ष प्रो. के.डी. गंगराडे एवं जे.पी. के निकटतम सहयोगी और चम्बल घाटी में दस्युओं के आत्मसमर्पण को प्रेरित करने वाले डा० एस. एन. सुब्बाराव ने हिस्सा लिया। 'लोकनायक जयप्रकाश अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र' के राष्ट्रीय सचिव श्री अभय सिन्हा ने भी अपने बहुमूल्य विचार रखे। प्रस्तुत है संगोष्ठी में व्यक्त श्री
-: 11 अक्टूबर 2001 :-
जे.पी. जन्म शताब्दी वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 11 अक्टूबर 2001 को नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय, तीनमूर्ति भवन के सभागार में किया गया। 'लोकनायक जयप्रकाश अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र' द्वारा आयोजित संगोष्ठी के मुख्य अतिथि श्री इन्द्रकुमार गुजराल (पूर्व प्रधानमंत्री), श्री रवि राय (पूर्व लोकसभा अध्यक्ष), श्री श्यामनंदन मिश्र (पूर्व विदेशमंत्री), श्री चक्र प्रसाद बस्तोला (नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री), श्री कन्हैया लाल नंदन (प्रख्यात साहित्यकार), हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर श्री गंगा प्रसाद विमल, डोगरी की प्रमुख कवियत्री डॉ. पद्मा सचदेव, साहित्यकार श्री राजनारायण बिसारिया, वरिष्ठ गांधीवादी नेता श्री वी. आर. नंदा, पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री त्रिलोकनाथ। संगोष्ठी की मुख्य उपलब्धि थी दक्षिण एशिया के नौ राष्ट्रों के राजदूतों की उपस्थिति। प्रस्तुत है उक्त संगोष्ठी में विभिन्न वक्ताओं द्वारा रखे विचार, जिनके अन्तर्गत जे.पी. की मार्क्सवाद से गांधीवाद तक की यात्रा का बिंब है और जनता की भलाई के लिये जे.पी. का संघर्ष एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों का पुनरावलोकन भी।
-: 09 सितम्बर 2001 :-
राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय में 9 सितम्बर 2001 की संध्या अविस्मरणीय रहेगी। भारतीय ज्ञानपीठ एवं लोकनायक जयप्रकाश अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र के सामूहिक प्रयास के अंतर्गत बिन पानी सब सून संगोष्ठी का आयोजन तो हुआ ही साथ में मैग्ससे पुरस्कार विजेता एवं जलपुरुष श्री राजेन्द्र सिंह का सम्मान भी उक्त सध्या का मुख्य आकर्षण रहा। संगोष्ठी की अध्यक्षता राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय के निदेशक डॉ. वाई. पी. आनन्द ने किया एवं मुख्य अतिथि थे प्रो. के. डी. गंगराडे। अन्य वक्ताओं में प्रख्यात पर्यावरण विद् श्री अनुपम मिश्रा पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री त्रिलोकनाथ, पूर्व उद्योग विकास आयुक्त श्री वल्लम शरण, साहित्यकार गंगा प्रसाद विमान भारतीय ज्ञानपीठ के मानद निदेशक डॉ. दिनेश मिश्रा एवं कथाकार वीरेन्द्र सक्सेना थे।
-: 07 अक्टूबर 2002 :-
राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय में 9 सितम्बर 2001 की संध्या अविस्मरणीय रहेगी। भारतीय ज्ञानपीठ एवं लोकनायक जयप्रकाश अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र के सामूहिक प्रयास के अंतर्गत बिन पानी सब सून संगोष्ठी का आयोजन तो हुआ ही साथ में मैग्ससे पुरस्कार विजेता एवं जलपुरुष श्री राजेन्द्र सिंह का सम्मान भी उक्त सध्या का मुख्य आकर्षण रहा। संगोष्ठी की अध्यक्षता राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय के निदेशक डॉ. वाई. पी. आनन्द ने किया एवं मुख्य अतिथि थे प्रो. के. डी. गंगराडे। अन्य वक्ताओं में प्रख्यात पर्यावरण विद् श्री अनुपम मिश्रा पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री त्रिलोकनाथ, पूर्व उद्योग विकास आयुक्त श्री वल्लम शरण, साहित्यकार गंगा प्रसाद विमान भारतीय ज्ञानपीठ के मानद निदेशक डॉ. दिनेश मिश्रा एवं कथाकार वीरेन्द्र सक्सेना थे।
विश्वनागरिक जयप्रकाश
"जे.पी. की मुख-मुदा कुछ गंभीर और अन्यमनस्क अध्यापक के जैसी है। आधी किनारावाला उनका चश्मा संजीदगी की उनकी चमक को बढ़ाता रहता है। रूप उनका गोरा है, और जैसा कि विन्सेण्ट शीन ने कहा है, "उनके रंग-ढंग में उनके आवाज और बात-चीत में, आदि से अंत तक एक प्रकार की कुलीनता व्यक्त होती रहती है। उनमें अविचल स्वस्थता और गांधी की-सी प्रसन्न गंभीरता है।" उनके आवाज धीमी, सुसंवादी और थोड़ी थकी-थकी सी होती है। एक धर्माचार्य की-सी अदा के साथ कही गई उनकी कुछ बातों पर से हम उनकी जैसी कल्पना करते हैं, उसकी तुलना में उनका व्यक्तित्व बहुत ही मोहक है। वे विनयशील, उदारमना और नम्र दिखायी पड़ते हैं। उनकी वक्रोक्तियां, उनके व्यंग्य, कभी बहुत गहरे नहीं होते। भारत के दूसरे समकालीन राजपुरुषों में जिसके विशेष दर्शन नहीं होते, उस कोटि की सुरुचि, संस्कारिता और अनंत धैर्य के दर्शन हमें जय प्रकाश जी में होते हैं। मोरारजी देशाई से भिन्न जयप्रकाश जी की गांधीवादी साधुता कभी यंत्रवत् या दूसरों के लिए बोझ रूप नहीं बनती। वे शाकाहारी है और शक्कर की बीमारी के मरीज है. फिर भी अपने आहार के बारे में वे कभी गुलगपाड़ा या दिखावा नहीं करते। वे एक ऐसे विश्व नागरिक हैं जो सबके साथ मिल जाते हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी निराली और सुस्पष्ट भारतीयता कभी छोड़ी नहीं है।"
-वेल्स हंगेन
-: 10 अक्टूबर 2003 :-